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 यूजीसी में क्या है धारा 3C और धारा 3E,

 यूजीसी में क्या है धारा 3C और धारा 3E, जिन पर एक्शन में आया सुप्रीम कोर्ट 

यूजीसी के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. इसमें धारा 3सी और धारा 3ई को लेकर सबसे ज्यादा विरोध था, जिस पर याचिकाकर्ताओं के तर्कों को प्रथमदृष्टया अदालत ने सही माना.

शब्द अग्नि न्यूज़ । नई दिल्ली:विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के जातिगत भेदभावों से जुड़े नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. इसमें UGC की धारा 3C को अदालत में चुनौती दी गई थी. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि फिलहाल 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे. यूजीसी के 13 जनवरी 2026 को लागू नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक टिप्पणी में कहा है कि जब जातिगत भेदभाव की परिभाषा व्यापक हो तो इसे सिर्फ एक वर्ग तक सीमित करना समानता के अधिकार (अनुच्छेद 14) का उल्लंघन प्रतीत होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने नए दिशानिर्देशों पर कहा था पहली नजर में देखा जाए तो 2026 की UGC नियमावली के कुछ प्रावधान अस्पष्ट हैं. इन नियमों के दुरुपयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि इस केस में कई संवैधानिक सवाल उठते हैं, जिन पर गहन सुनवाई जरूरी है. सभी संबंधित याचिकाओं को तीन जजों की पीठ के समक्ष एक साथ सुना जाएगा

सेक्शन 3C क्या है?

यूजीसी के नए नियमों के अनुसार, सेक्शन 3C में जाति आधारित भेदभाव (Caste Discrimination) की परिभाषा दी गई है. जाति आधारित भेदभाव का मतलब है, केवल जाति या जनजाति के आधार पर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के साथ किया गया कोई भी भेदभाव.

सामान्य वर्ग को अलग रखना

आलोचकों और याचिकाकर्ताओं (जैसे अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन) का तर्क है कि यह परिभाषा सिर्फ SC, ST और OBC को सुरक्षा देती है. सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों को पूरी तरह बाहर कर देती है. उनके अनुसार, अगर किसी सवर्ण छात्र के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो वह इस नियम के तहत शिकायत नहीं कर पाएगा.

दुरुपयोग की आशंका

सवर्ण छात्रों और आलोचकों का कहना है कि यह नियम एकतरफा है और इसमें झूठी शिकायत करने वालों के खिलाफ दंड का प्रावधान भी हटा दिया गया है, जिससे इसका दुरुपयोग हो सकता है.

यूजीसी की धारा 3(E) क्या है

यूजीसी 2026 की धारा 3(E) तय करती है कि पीड़ित व्यक्ति’ (Aggrieved Person) कौन है. यानी उच्च शिक्षा संस्थानों (Universities, Colleges) में भेदभाव की शिकायत करने का अधिकार किसे है. इस धारा के अनुसार, ‘पीड़ित व्यक्ति’ वह छात्र, शिक्षक या शिक्षणेत्तर कर्मचारी है जो अगर इन वर्गों का कोई भी व्यक्ति यह महसूस करता है कि उसके साथ उसकी जाति के कारण भेदभाव, उत्पीड़न या दुर्व्यवहार हुआ है, तो वह नए नियमों के तहत बनी समानता समिति (Equity Committee) में शिकायत दर्ज करा सकता है.

  • अनुसूचित जाति (SC) से संबंधित हो
  • अनुसूचित जनजाति (ST) से संबंधित हो
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) से संबंधित हो

सुप्रीम कोर्ट के 4 बड़े सवाल

  1. क्या धारा 3C में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा, इस पूरी नियमावली के उद्देश्य से तार्किक और उचित ढंग से जुड़ी है. खासकर जब इसकी अलग प्रक्रिया तय नहीं की गई है?
  2. क्या ये नियम SC/ST/OBC के अंदर अति पिछड़ा वर्ग को पर्याप्त सुरक्षा और संरक्षण देते हैं
  3. क्या सेक्शन 7(D) के तहत हॉस्टल, क्लास या मेंटरशिप ग्रुप के आवंटन में अलगाव की अनुमति देना, संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और समानता के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकता है?
  4. 2012 के नियम में मौजूद रैगिंग को 2026 के नियमों में भेदभाव के तौर पर शामिल न करना, क्या पीछे की ओर ले जाने वाला कदम है और क्या यह अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है?

    2012 और 2026 के नियमों में अंतर

    1. यूजीसी के 2012 के नियम मुख्य रूप से SC और ST पर केंद्रित थे. जबकि नए नियमों में SC, ST के साथ OBC को भी शामिल किया गया
    2. शिकायत निवारण एक एंटी डिस्क्रिमिनेशन अफसर होता था जबकि 2026 के नियमों में पूरी इक्विटी कमेटी (Equity Committee) और लोकपाल की नियुक्ति
    3. यूजीसी के 2012 के नियमों में कमेटी में किसी जाति के विशेष सदस्य होने का प्रावधान नहीं था, जबकि 2026 के प्रावधानों में SC-ST,OBC, महिला, दिव्यांग होना अनिवार्य
Shabd Agni
Author: Shabd Agni

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