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May 26, 2026 1:11 am

बैठक हुई नहीं, बयान आ गया “जांच पूरी” का!

आजीविका मिशन की जांच पर उठे बड़े सवाल

शब्द अग्नि अनुराग बजाज

दमोह- राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन दमोह में करोड़ों रुपए के कथित हेरफेर के मामले में अब जांच प्रक्रिया ही सवालों के घेरे में आ गई है। सहारा संकुल स्तरीय संगठन (CLF) की पूर्व अध्यक्ष शोभा कोरी द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच आखिर हुई कैसे, जब जांच की सबसे अहम बैठकें ही आयोजित नहीं हो सकीं?
दस्तावेजों के अनुसार जिला प्रबंधक शैलेंद्र श्रीवास्तव ने मामले की जांच और पक्षकारों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए 12 मार्च 2026, 17 मार्च 2026 और 8 अप्रैल 2026 को लगातार पत्र लिखकर बैठक बुलाने के निर्देश दिए थे। इन पत्रों में प्रभारी विकासखंड प्रबंधक राजेंद्र उपाध्याय सहित संगठन के पूर्व और वर्तमान पदाधिकारियों को उपस्थित कराने की बात कही गई थी। लेकिन आरोप है कि न तो बैठकें ठीक से आयोजित हुईं और न ही शिकायतकर्ता पक्ष को बुलाया गया।
पूर्व अध्यक्ष शोभा कोरी का कहना है कि उन्हें किसी भी बैठक की जानकारी तक नहीं दी गई, जबकि शिकायत उन्हीं की ओर से की गई थी। उनका आरोप है कि प्रभारी विकासखंड प्रबंधक राजेंद्र उपाध्याय ने जांच प्रक्रिया में सहयोग नहीं किया और न ही किसी बैठक में शामिल हुए। ऐसे में बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जब शिकायतकर्ता, रिकॉर्ड और संबंधित अधिकारी आमने-सामने बैठे ही नहीं, तो फिर जांच आखिर पूरी कैसे हो गई.?
यही वजह है कि अब जिला पंचायत सीईओ प्रवीण फुलपगारे का बयान भी सवालों के घेरे में है। सीईओ का कहना है कि जांच लगभग पूरी हो चुकी है, प्रतिवेदन आना शेष है। लेकिन जब जिला प्रबंधक खुद बार-बार पत्राचार कर बैठक बुलाने की कोशिश कर रहे थे और बैठकें ही नहीं हो पाईं, तो फिर यह “लगभग पूरी” जांच किस आधार पर मान ली गई.?
मामले को लेकर अब यह चर्चा तेज हो गई है कि कहीं जांच सिर्फ फाइलों और ए.सी. वाले कमरों तक सीमित तो नहीं रह गई। शिकायतकर्ता पक्ष को सुने बिना, रिकॉर्ड का आमना-सामना कराए बिना और जिम्मेदार अधिकारियों की उपस्थिति के बिना यदि जांच पूरी मानी जा रही है, तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रतिवेदन आने से पहले ही निष्कर्ष तय कर लिए गए हैं.?
सूत्रों की मानें तो अब यह आशंका भी जताई जा रही है कि जांच प्रतिवेदन में पूर्व अध्यक्ष शोभा कोरी के आरोपों को खारिज कर प्रभारी विकासखंड प्रबंधक राजेंद्र उपाध्याय को क्लीन चिट दी जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो करोड़ों रुपए के लेनदेन पर उठे सवालों से ज्यादा चर्चा जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर होगी।
फिलहाल पूरा मामला आजीविका मिशन की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बन चुका है। अब देखना होगा कि जांच रिपोर्ट सच सामने लाती है या फिर शिकायतें सरकारी फाइलों की धूल में दबकर रह जाएंगी।

Shabd Agni
Author: Shabd Agni

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