शब्द अग्नि न्यूज़ । इंदौर। इस वर्ष होलिका दहन और धुलेंडी की तारीखों पर असमंजस बना हुआ है। दोनों ही तारीखों को लेकर ज्योतिषाचार्यों के अलग- अलग मत हैं। इस असमंजस का मुख्य कारण है 3 मार्च को लगने वाले चंद्रग्रहण और सूतक काल । इस विषय पर हमने प्रमुख पंडितों और ज्योतिषाचार्यों से बात की और जाना कि किस समय होलिका दहन करना और धुलेंडी खेलना उचित रहेगा।
• शासकीय संस्कृत महाविद्यालय के विभागाध्यक्ष डॉक्टर विनायक पांडे ने बताया कि होलिका दहन दो मार्च को ही होगा। क्योंकि धर्मशास्त्रों का अभिमत है। पूर्णिमा प्रदोषकाल में होती है तभी होलिका दहन होना चाहिए। अगले दिन पूर्णमा है पर प्रदोषकाल में नहीं है। इसलिए दो को होगा। हालांकि दो को भद्रा भी है और भद्रा पूरी रात और सुबह 5.30 बजे तक रहेगी।
निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु के अनुसार भद्रा में राखी और होली नहीं मनाते हैं। इस पर शास्त्रों में बताया गया है। कि भद्रा के मुख को छोड़कर होलिका दहन कर सकते हैं। प्रदोषकाल में भद्रा का मुख छोड़कर दो मार्च को शाम 6.28 से रात 8.52 तक होली जलाई जा सकती है। अगले दिन तीन मार्च को पूरे भारत में है चंद्रग्रहण है। ग्रहण दोपहर 3 बजकर 21 मिनट से शुरू होकर शाम 6 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। वहीं चंद्रोदय शाम 6.30 बजे होगा और फिर शाम 6.47 पर ग्रहण खत्म हो जाएगा। इस दिन सूतक भी रहेंगे। सुबह 6.30 से शाम को 6.47 तक सूतक रहेगा। इस समय में धुलेंडी सूतक में रंग खेलना कितना शुभ- पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक वहीं कुछ लोग कह रहे हैं कि इस स्थिति में भी जब दो मार्च को दहन है और तीन को धुलेंडी है तब इस दिन सूतक और ग्रहण के प्रभाव में रंग-गुलाल खेलना शुभ नहीं माना जाता। इस पर आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने कहा कि होलिका दहन शुभ मुहूर्त में करना जरूरी है। तीन मार्च को रंग खेला जा सकता है। इसमें कोई परेशानी नहीं है।
मनाई जा सकती है और रंग खेल सकते हैं। डॉक्टर विनायक पांडे ने बताया कि पर्वकाल का महत्व है और प्रदोषकाल की तिथि व्याप्त होनी चाहिए। दो दिन पूर्णमा है लेकिन जिस दिन प्रदोषकाल होता है तभी होलिका दहन होता है। यदि ग्रहण नहीं होता तो तीन मार्च को ही होलिका दहन होता और चार मार्च को धुलेंडी होती। मप्र ज्योतिष एवं विद्वत परिषद के अध्यक्ष आचार्य पंडित रामचंद्र शर्मा वैदिक ने बताया कि इस वर्ष तीन मार्च को होलिका दहन का मुहूर्त
था लेकिन इसी दिन चंद्रग्रहण आ रहा है। वहीं पूर्णिमा ग्रहणकाल और प्रदोष के पूर्व में ही समाप्त हो रही है। इस तरह की स्थिति में धर्मसिंधु के अनुसार दो मार्च
ही होलिका दहन प्रदोषकाल में करना होगा और तीन मार्च को धुलेंडी होगी। दो मार्च को शाम 6 से रात्रि 8 बीच प्रदोष काल का समागम होगा। यह सबसे अच्छा समय होगा होलिका दहन का यदि ग्रहण नहीं होता तो तीन मार्च को ही दहन होता और चार मार्च को होली खेली जाती।
Author: Shabd Agni
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