वाटर प्लांट और टैंकर संचालन का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं, भूजल निकासी पर नियंत्रण व्यवस्था को लेकर बढ़ी चिंता
शब्द अग्नि / इंदौर शहर में लगातार गिरते भूजल स्तर के बीच निजी स्तर पर हो रहे पानी के दोहन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। शहर में संचालित बड़ी संख्या में निजी वाटर प्लांट और हाईराइज परियोजनाओं में भूजल का उपयोग तो किया जा रहा है, लेकिन प्रतिदिन कितनी मात्रा में पानी निकाला और बेचा जा रहा है, इसका कोई समग्र और पारदर्शी रिकॉर्ड संबंधित विभागों के पास उपलब्ध नहीं है।
कोई रिकॉर्ड नहीं भविष्य में संकट के आसार
जानकारी के अनुसार व्यावसायिक उपयोग के लिए संचालित कई वाटर प्लांट भूजल का इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पानी की निकासी और बिक्री का नियमित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार नहीं किया गया तो भविष्य में भूजल संरक्षण की चुनौती और गंभीर हो सकती है। वर्तमान व्यवस्था में कई स्थानों पर निगरानी केवल दस्तावेजों और स्वघोषणा तक सीमित बताई जा रही है।
बड़ी बड़ी बिल्डिंगों में हो रही सप्लाई
शहर में बड़ी संख्या में निजी हाईराइज इमारतें भी बोरवेल के माध्यम से जलापूर्ति कर रही हैं। ऐसे में यह जानना मुश्किल हो जाता है कि प्रतिदिन कितनी मात्रा में भूजल का दोहन हो रहा है। जल संरक्षण से जुड़े जानकारों का मानना है कि सभी व्यावसायिक जल स्रोतों पर डिजिटल फ्लो मीटर, नियमित निरीक्षण और ऑनलाइन मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्था लागू किए बिना भूजल के अनियंत्रित दोहन पर प्रभावी रोक लगाना कठिन होगा।
उठ रहे प्रमुख सवाल
- शहर में रोजाना कितना भूजल निकाला जा रहा है?
- निजी वाटर प्लांट और टैंकरों के पानी की वास्तविक मात्रा का रिकॉर्ड किसके पास है?
- भूजल दोहन की निगरानी के लिए डिजिटल व्यवस्था कब लागू होगी?
- जल संरक्षण के नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किस विभाग की है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी और जल संकट को देखते हुए भूजल संसाधनों की पारदर्शी निगरानी, नियमित ऑडिट और सख्त नियमन समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है। इससे न केवल पानी के अनियंत्रित दोहन पर रोक लगेगी, बल्कि भविष्य के जल संकट से निपट ने में भी मदद मिलेगी।
Author: Shabd Agni
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