कान्हा टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण की संवेदनशील मिसाल
शब्द अग्नि / सीमान्त राव बन्सोड़ बालाघाट – कान्हा टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण और उपचार के प्रति संवेदनशीलता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण सामने आया है। गंभीर रूप से बीमार पाए गए एक बाघ को समय रहते रेस्क्यू कर विशेषज्ञों की निगरानी में उपचार उपलब्ध कराया गया, लेकिन लगातार चिकित्सा प्रयासों के बावजूद उसकी मृत्यु हो गई। वन विभाग ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के दिशा-निर्देशों के अनुसार पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता और वैज्ञानिक तरीके से संपन्न की।
जानकारी के अनुसार, 4 जून 2026 को हाथी गश्ती के दौरान किसली परिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 777 स्थित संदूक खोल क्षेत्र में एक बाघ अत्यंत अस्वस्थ अवस्था में दिखाई दिया था। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश पर तत्काल रेस्क्यू अभियान चलाकर बाघ को मुक्की क्वारंटाइन सेंटर में भर्ती कराया गया। प्रारंभिक जांच में उसमें केनाइन डिस्टेंपर रोग के लक्षण पाए गए थे।
बाघ के उपचार के लिए कान्हा टाइगर रिजर्व के वन्यजीव स्वास्थ्य अधिकारियों, नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा एवं विज्ञान विश्वविद्यालय जबलपुर तथा वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट (डब्ल्यूसीटी) के विशेषज्ञ चिकित्सकों की संयुक्त टीम लगातार सक्रिय रही। इसके अलावा देश के वरिष्ठ वन्यजीव विशेषज्ञों से भी तकनीकी सलाह लेकर उपचार किया गया। हालांकि, गहन चिकित्सा और सतत निगरानी के बावजूद बाघ को बचाया नहीं जा सका।
शव परीक्षण के बाद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और नामित सदस्यों की उपस्थिति में बाघ का सम्मानपूर्वक भस्मीकरण किया गया। इस दौरान क्षेत्र संचालक रवींद्र मणि त्रिपाठी, सहायक संचालक अजय ठाकुर, तहसीलदार बैहर जमुना प्रसाद भगत, एनटीसीए प्रतिनिधि परशुराम चौहान, फील्ड बायोलॉजिस्ट अजिंक्य देशमुख, मानसेवी वन्यजीव अभिरक्षक चंद्रेश खरे, सरपंच शकुंतला मरकाम सहित वन विभाग का अमला मौजूद रहा।
Author: Shabd Agni
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