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August 4, 2026 3:14 am

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दतिया उपचुनाव में कांग्रेस ने बाजी मारी

मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक ने लगाया जोर, फिर भी “हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे”

शब्द अग्नि / यासिर पठान । दतिया विधानसभा उपचुनाव का नतीजा महज एक सीट की हार-जीत नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की सियासत में कई सवाल छोड़ गया है। कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत के बाद भाजपा के रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मजबूत माने जाने वाले दतिया में ऐसा क्या हुआ कि मुख्यमंत्री से लेकर मंत्री और संगठन के तमाम चेहरे मैदान में उतरने के बावजूद भाजपा के हाथ से सीट फिसल गई?

नामांकन में मुख्यमंत्री साथ, मैदान में मंत्री साथ… फिर भी नतीजा साथ नहीं

भाजपा ने दतिया को हल्के में नहीं लिया। प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और नरोत्तम मिश्रा की मौजूदगी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पार्टी पूरी ताकत के साथ मैदान में है। इसके बाद चुनावी मैदान में प्रदेश सरकार के मंत्रियों और पार्टी के बड़े नेताओं की सक्रियता भी दिखाई दी। सभाएं हुईं, बैठकें हुईं, रणनीतियां बनीं और जीत के दावे भी हुए। लेकिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यही है कि मंच पर नेता चाहे जितना बड़ा हो, अंतिम फैसला मतदान केंद्र के भीतर बैठा मतदाता करता है। ओर जब ईवीएम खुली तो तस्वीर कुछ और ही निकली नेताओं की गिनती भाजपा के पक्ष में थी, लेकिन वोटों की गिनती कांग्रेस के पक्ष में चली गई।

नरोत्तम फैक्टर’ पर भी उठे सवाल

दतिया लंबे समय से नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। ऐसे में इस सीट पर भाजपा की हार को केवल प्रत्याशी की हार मान लेना शायद राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा। अब चर्चा यह भी है कि क्या दतिया में नरोत्तम मिश्रा का प्रभाव कमजोर पड़ा है? या फिर जनता ने इस बार स्थानीय राजनीति, प्रत्याशी और सरकार के कामकाज को अपने अलग नजरिए से तौला? राजनीतिक गलियारों में इसी को लेकर एक तंज सुनाई दे रहा है—

हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे

नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटना सिर्फ एक टिकट का कटना नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की सियासत में एक ऐसे दौर का संकेत माना जा रहा है, जहां कभी बेहद प्रभावशाली माने जाने वाले चेहरे भी संगठन के फैसले के सामने बेबस नजर आते हैं। सियासत में कभी जिनके इशारे पर समीकरण बनते-बिगड़ते थे, आज वही समीकरण उनके खिलाफ खड़े दिखाई दे रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि राजनीति में अक्सर कहा जाता है—हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे।  सवाल यही है कि कहीं नरोत्तम मिश्रा की राजनीतिक पारी का यह पड़ाव सिर्फ उनकी अपनी कहानी तो नहीं, बल्कि उनके साथ खड़े रहे कई सियासी किरदारों के लिए भी खतरे की घंटी तो नहीं? टिकट कटने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या यह सिर्फ एक चेहरे की विदाई है या उस सियासी प्रभाव के कमजोर पड़ने की शुरुआत, जिसकी छाया लंबे समय तक मध्यप्रदेश की राजनीति पर दिखाई देती रही?

अब वक्त ही बताएगा कि कहानी में सिर्फ  हम तो डूबेंगे  है या सचमुच  सनम तुमको भी ले डूबेंगे… वाला अध्याय भी बाकी है

पटाक्षेप’ ने बढ़ाई राजनीतिक चर्चा

नतीजे के बाद नरोत्तम मिश्रा के उस बयान ने भी सियासी चर्चाओं को हवा दे दी, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें अब किसी पद की इच्छा नहीं है और उनका “पटाक्षेप” हो गया है। राजनीति में ऐसे बयान सामान्य बयान नहीं माने जाते। समर्थक इसे भावनात्मक प्रतिक्रिया मान सकते हैं, विरोधी इसे राजनीतिक संकेत की तरह पढ़ सकते हैं और विश्लेषक इसके अलग-अलग अर्थ निकाल सकते हैं।

मंत्रियों की मेहनत का हिसाब अब संगठन की कॉपी में

चुनाव के दौरान मंत्रियों की सक्रियता का मकसद सरकार की योजनाओं और भाजपा के पक्ष में माहौल को वोट में बदलना था।लेकिन अब पार्टी के सामने एक कठिन सवाल है—इतने बड़े राजनीतिक अमले की मेहनत वोट में क्यों नहीं बदल पाई?क्योंकि चुनावी राजनीति में सभा कितनी बड़ी थी, मंच पर कितने नेता थे और कितने भाषण हुए—इसका हिसाब इतिहास नहीं रखता।

इतिहास तो अंत में सिर्फ यह लिखता है—

किसे कितने वोट मिले और कौन हार गया। अब भाजपा संगठन के भीतर निश्चित तौर पर यह सवाल उठेगा कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की नब्ज को समझने में आखिर कहां चूक हुई।

कांग्रेस के लिए संजीवनी, भाजपा के लिए चेतावनी

कांग्रेस के घनश्याम सिंह की जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा कर दी है। भाजपा के मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र में जीत कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से राजनीतिक संजीवनी है। वहीं भाजपा के लिए यह परिणाम एक चेतावनी की तरह देखा जा सकता है कि **सिर्फ बड़े चेहरे, सरकारी मशीनरी की चर्चा और चुनावी सभाएं जीत की गारंटी नहीं होतीं। जमीन पर संगठन कितना मजबूत है और जनता के बीच पार्टी की स्वीकार्यता कितनी है—इसका फैसला आखिरकार मतपेटी ही करती है।

 

 

Shabd Agni
Author: Shabd Agni

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