सवाल सिर्फ निर्माण पर नहीं, समय पर चुप्पी और अब मचे शोर पर भी
शब्द अग्नि / ब्रजेश सोनी
दमोह / बांदकपुर धाम कॉरिडोर को लेकर इन दिनों चल रहा विवाद अब केवल निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह जनभावनाओं, स्थानीय राजनीति, सोशल मीडिया अभियानों और प्रशासनिक निर्णयों के टकराव का विषय बनता जा रहा है। एक ओर कॉरिडोर की वर्तमान रूपरेखा, मुख्य द्वार की व्यवस्था, निर्माण गुणवत्ता और स्थानीय सुझावों की अनदेखी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह सवाल भी उतनी ही मजबूती से खड़ा हो रहा है कि जब परियोजना की डीपीआर तैयार हो रही थी, नक्शे स्वीकृत हो रहे थे और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा रहे थे, तब विरोध के स्वर इतने कमजोर क्यों थे।
लोगों के सुझावों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
हाल ही में कलेक्टर प्रताप नारायण यादव की समीक्षा बैठक में यह बात सामने आई कि परियोजना तैयार करते समय स्थानीय लोगों और क्षेत्र की परिस्थितियों से परिचित लोगों के सुझावों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में बताती है कि योजना निर्माण के स्तर पर कुछ कमियां अवश्य रही हैं। निर्माण कार्यों में देरी, गुणवत्ता संबंधी शिकायतें और एजेंसी को नोटिस जारी करने की नौबत भी यह संकेत देती है कि परियोजना का क्रियान्वयन अब तक अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच पाया है। ऐसे में जो लोग निर्माण की गुणवत्ता, समयसीमा और धार्मिक स्वरूप को लेकर सवाल उठा रहे हैं, उनकी चिंताओं को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।
लेकिन दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जिन मुद्दों को लेकर आज सोशल मीडिया पर तीखी बहस छिड़ी हुई है, उन पर तब व्यापक जनआंदोलन या संगठित विरोध देखने को नहीं मिला, जब योजनाएं अंतिम रूप ले रही थीं। कॉरिडोर की स्वीकृति के समय अधिकांश लोग इसे बड़ी उपलब्धि बताकर स्वागत कर रहे थे। अब जब निर्माण कार्य धरातल पर उतर चुका है, तब लगातार विवाद खड़े करना और हर निर्णय को संदेह की नजर से देखना भी कई लोगों को राजनीतिक और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित दिखाई दे रहा है।
Author: Shabd Agni
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