पॉकेट गवाह प्रकरण में तीन साल के लिए टीआई से बने एसआई पद पदावनत, 742 मामलों में इरशाद और 504 में नवीन को बनाया था गवाह
हत्या, दुष्कर्म, पॉक्सो और NDPS जैसे गंभीर मामलों की विवेचना में एक ही गवाहों के बार-बार इस्तेमाल पर उठे सवाल
शब्द अग्नि /इंदौर। खजराना थाने के पूर्व थाना प्रभारी दिनेश वर्मा को चर्चित ‘पॉकेट गवाह’ प्रकरण में गंभीर अनियमितताओं का दोषी पाए जाने के बाद पुलिस विभाग ने बड़ी कार्रवाई की है। पुलिस आयुक्त संतोष कुमार सिंह ने विभागीय जांच के आधार पर वर्मा को तीन वर्ष के लिए निरीक्षक पद से पदावनत कर उप निरीक्षक (SI) बना दिया है। आठ पन्नों के विस्तृत आदेश में विभागीय जांच के दौरान उनके खिलाफ लगाए गए कई आरोपों के सिद्ध होने का उल्लेख किया गया है।
तीन साल खजराना थाने में रहे टीआई
दिनेश वर्मा 31 अगस्त 2020 से 2 अगस्त 2023 तक खजराना थाने में थाना प्रभारी के पद पर पदस्थ रहे। विभागीय जांच में इस अवधि के दौरान उनके थाने में विवेचना किए गए मामलों में गवाहों के चयन को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आईं।
जांच में पाया गया कि इस दौरान 742 प्रकरणों में इरशाद पुत्र अब्दुल हकीम तथा 504 प्रकरणों में नवीन पुत्र रामचंद्र चौहान को गवाह बनाया गया। खास बात यह रही कि इन मामलों में हत्या, हत्या का प्रयास, धोखाधड़ी, कूटरचना, छेड़छाड़, दुष्कर्म, पॉक्सो एक्ट, आबकारी अधिनियम और एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर अपराधों से जुड़े प्रकरण भी शामिल थे।
पुलिस रेगुलेशन के नियमों का उल्लंघन
पुलिस आयुक्त के आदेश में कहा गया है कि दिनेश वर्मा ने पुलिस रेगुलेशन के पैरा 64(2), 64(3) और पैरा 582 का उल्लंघन किया।
आदेश में थाना प्रभारी की जिम्मेदारी का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि थाना प्रभारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के कार्यों के लिए भी उत्तरदायी होता है। विभागीय जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि वर्मा ने इस जिम्मेदारी का निर्वहन अपेक्षित निष्ठा और ईमानदारी के साथ नहीं किया।
जब्ती पत्रक पर कथित फर्जी हस्ताक्षर का मामला
जांच में एक प्रकरण ऐसा भी सामने आया जिसमें जब्ती पत्रक पर गवाहों के कथित फर्जी हस्ताक्षर किए जाने की बात सामने आई। विभागीय कार्रवाई में माना गया कि इस तरह की प्रक्रिया से आरोपियों को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाने का प्रयास हुआ।
इस मामले की जांच तत्कालीन सीएसपी जयंत राठौर ने की थी। उनकी गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर विभागीय जांच की प्रक्रिया शुरू की गई।
वर्मा ने आरोपों से किया इनकार
विभागीय जांच के दौरान दिनेश वर्मा ने अपने बचाव में आरोपों को स्वीकार नहीं किया। उनका कहना था कि गवाहों का चयन संबंधित विवेचक द्वारा किया गया था, इसलिए इसके लिए उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने जब्ती पत्रक पर किए गए हस्ताक्षरों की जांच किसी विशेषज्ञ से कराने की मांग भी की।
वर्मा ने यह भी आरोप लगाया कि तत्कालीन अधिकारियों द्वारा गवाहों पर दबाव डाला गया था। हालांकि पुलिस आयुक्त ने इन तर्कों को संतोषजनक नहीं माना। आदेश में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्य विभागीय जांच में लगाए गए आरोपों की पुष्टि करते हैं।
एक ही गवाहों का बार-बार इस्तेमाल बना सबसे बड़ा सवाल
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह रहा कि एक ही थाने में अलग-अलग प्रकृति के सैकड़ों आपराधिक प्रकरणों में सीमित लोगों को बार-बार गवाह क्यों बनाया गया।
742 मामलों में इरशाद और 504 मामलों में नवीन का गवाह के रूप में सामने आना विभागीय जांच में गंभीर विषय बना। खासकर तब, जब इन मामलों में हत्या, दुष्कर्म, पॉक्सो और एनडीपीएस जैसे गंभीर अपराध भी शामिल थे।
इसी वजह से यह मामला पुलिस महकमे में ‘पॉकेट गवाह’ प्रकरण के नाम से चर्चित हुआ और अंततः विभागीय जांच के बाद निरीक्षक स्तर के अधिकारी के खिलाफ पदावनति जैसी कठोर कार्रवाई हुई।
पुलिस आयुक्त के कार्यकाल में तीसरी पदावनति
पुलिस आयुक्त संतोष कुमार सिंह के कार्यकाल में किसी निरीक्षक के खिलाफ पदावनति की यह तीसरी कार्रवाई बताई जा रही है। इससे पहले निरीक्षक रवींद्र सिंह गुर्जर और अजय वर्मा के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई की जा चुकी है।
इसके अलावा पुलिस विभाग में 20 से अधिक पुलिसकर्मियों को सेवा से बर्खास्त किए जाने और 100 से अधिक पुलिस अधिकारियों एवं कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच लंबित होने की जानकारी भी सामने आई है। इनमें कई थाना प्रभारी भी शामिल बताए गए हैं।
कठोर कार्रवाई से पुलिस महकमे में संदेश
दिनेश वर्मा की पदावनति को पुलिस विभाग में अनुशासन और विवेचना की गुणवत्ता को लेकर कड़ा संदेश माना जा रहा है। खासकर थाना प्रभारियों की जिम्मेदारी को लेकर विभागीय आदेश में की गई टिप्पणी महत्वपूर्ण है।
अब इस कार्रवाई के बाद उन आपराधिक प्रकरणों की विवेचना पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है, जिनमें बार-बार उन्हीं गवाहों को शामिल किया गया था। हालांकि किसी मामले में आगे की कानूनी स्थिति और उसके प्रभाव का निर्धारण संबंधित न्यायिक प्रक्रिया और केस रिकॉर्ड के आधार पर ही होगा।
Author: Shabd Agni
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