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June 10, 2026 12:15 am

ग्रामीणों ने पहाड़ का सीना चिर कर बनाया रास्ता

40 परिवारों  सहित पुरा गाँव खुद गेती फावड़े लेकर बना दशरथ मांझी 

शब्द अग्नि /बड़वानी

बिहार के दशरथ माझी ने अकेले पहाड़ काटकर रास्ता बनाया था। बड़वानी जिले के पाटी विकासखंड के खोड़ी पलास फलिया में अब घर-घर से दशरथ माझी निकल आए हैं। सरकार से वर्षों तक सड़क की मांग करने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला तो बड़वानी जिले के एक दूरस्थ आदिवासी फलिए के लोगों ने खुद ही सड़क बनाने का बीड़ा उठा लिया। गर्भवती महिलाओं, बीमारों और बुजुर्गों को वर्षों तक झोली और खाट के सहारे ऊबड़-खाबड़ रास्तों से अस्पताल और मुख्य सड़क तक पहुंचाना उनकी मजबूरी थी। अब ग्रामीण फावड़े, गैंती और अपने सीमित संसाधनों के सहारे पहाड़ और जंगल के बीच सड़क निर्माण में जुट गए हैं। दशरत मांझी की तरह ही  जिले के खोड़ी पलास फलिया में सामूहिक प्रयास चंदा जुटाया, गेंती-फावड़े उठाए और बना डाली सड़क जेसीबी किराए पर लेकर बनाई आधा किलोमीटर सड़क बना ली फर्क  सिर्फ इतना है कि यहां एक व्यक्ति नहीं, पूरा गांव पहाड़ का सीना चीरकर अपना रास्ता बना रहा है। वजह भी वही है, जो दशरथ माझी की थी व्यवस्था की बेरुखी और वर्षों की उपेक्षा। ग्राम पंचायत उबादगढ़ के इस आदिवासी फलिया में करीब 250 लोग और 40 परिवार रहते हैं।

प्रशासन की बेरुखी और जनप्रतिनिधियों के झूठे वादे

यहां तक पहुंचने के लिए अभी तक सड़क नहीं बन सकी थी। ग्रामीण वर्षों से पंचायत, जनपद पंचायत, जिला प्रशासन के कार्यालयों के साथ ही जनसुनवाई में सड़क निर्माण की मांग करते रहे। आवेदन दिए, अधिकारियों से मिले और जनप्रतिनिधियों को अपनी परेशानी बताई, लेकिन हर बार आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला। चुनाव के समय सड़क बनाने के वादे जरूर किए गए, मगर चुनाव खत्म होते ही वे भी खत्म हो गए।

10-10 हजार रुपए किए इकट्ठे

उबादगढ़ ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले खोड़ी पलास फलिया के ग्रामीणों ने ख़राब सड़क और अधूरे सरकारी वादों से तंग आकर सामूहिक रूप से करीब 10-10 हजार रुपये का योगदान दिया। इस राशि से जेसीबी मशीन किराए पर लेकर उन्होंने सड़क निर्माण कार्य शुरू किया। महज एक सप्ताह में ग्रामीण करीब एक किलोमीटर सड़क तैयार कर चुके हैं और अब आगे का मार्ग बनाने के लिए फिर से चंदा जुटाने की तैयारी कर रहे हैं।

इन समस्याओ से झुझते रहे ग्रामीण 

  • खाट और झोली ही एम्बुलेंस: इस डिजिटल युग में भी गांव के लोग गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को कपड़े की झोली या खाट पर लादकर पथरीले रास्तों से अस्पताल पहुंचाते हैं।
  • नेताओं की केवल कागजी हमदर्दी: हर चुनाव में बड़े-बड़े नेता और अफसर वोट मांगने तो आते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही वादे फाइलों के नीचे दफन हो जाते हैं।
  • पेट काटकर जुटाया चंदा: सरकारी भीख का इंतजार छोड़ने के बाद, गांव के हर एक परिवार ने अपनी मेहनत की कमाई से 10-10 हजार रुपये का चंदा इकट्ठा किया।
  • जेसीबी किराए पर, दो टीमों में काम: चंदे की रकम से ग्रामीणों ने सरकारी मशीनरी का इंतजार किए बिना जेसीबी किराए पर ली और पूरा गांव दो टीमों में बंटकर श्रमदान में जुट गया।
  • घर की महिलाओं ने भी संभाला मोर्चा: घर का चूल्हा-चौका और खेती का काम निपटाने के बाद गांव की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पहाड़ काटने में जुटी हैं।
250 से ज्यादा है गांव की आबादी
करीब 30 से 35 परिवारों और 250 से अधिक आबादी वाले इस फलिया की मुख्य सड़क से कनेक्टिविटी वर्षों से नहीं हो पाई है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेताओं और अधिकारियों द्वारा किए गए आश्वासन केवल वादे बनकर रह गए। ग्रामीणों ने हाल ही में 14 वर्षीय सखाराम की घटना का जिक्र करते हुए बताया कि बीमारी के दौरान उसे झोली में लिटाकर एक स्थानीय चिकित्सक के पास ले जाना पड़ा था, क्योंकि गांव तक कोई सड़क नहीं थी।

ग्रामीणों का कहना है की

 

ग्रामीण रुमति बाई का कहना है की पीने का पानी हो या खेती का खाद-बीज, सब सिर पर ढोकर लाना पड़ता है। कई लोग तो रास्ते की थकान से ही बीमार पड़ जाते हैं। अभी हमारा चंदे का पैसा खत्म हो गया है, लेकिन हम रुकेंगे नहीं। दोबारा चंदा करेंगे और आगे की सड़क भी खुद ही खोद डालेंगे। गांव के युवक मोहन बताते हैं कि वर्षों से उनकी सबसे कठिन जिम्मेदारी खेत या बाजार जाना नहीं, बल्कि गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार लोगों को झोली में उठाकर पहाड़ियों के रास्ते मुख्य सड़क तक पहुंचाना रही है। अब वही युवक गांव की सड़क बनाने में जुटे हुए हैं। मोहन ने कहा, ‘गर्भवती महिलाओं और मरीजों को झोली में ले जाना पड़ता था। हमने कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अब तक लगभग एक किलोमीटर सड़क बना चुके हैं, लेकिन हमारी राशि खत्म हो गई है। जल्द ही फिर से धन जुटाकर एक और किलोमीटर सड़क का निर्माण करेंगे।’

महिलाओं ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

इस अभियान में महिलाओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। ग्रामीण महिला रूमती बाई ने बताया, ‘घर का काम और खाना बनाने के बाद हम भी सड़क निर्माण में हाथ बंटाते हैं। यहां पीने का पानी, खाद, बीज और कृषि उपकरण तक सिर पर ढोकर लाने पड़ते हैं। खराब रास्ते के कारण लोग थककर बीमार पड़ जाते हैं।’

 

Shabd Agni
Author: Shabd Agni

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