जनपद में 6 पंचायतों पर 2.60 करोड़, 25 पंचायतें लगभग खाली हाथ, शुरुआती दो महीनों में बजट वितरण पर उठे गंभीर सवाल
शब्द अग्नि / अनुराग बजाज / दमोह जनपद पंचायत में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के बजट वितरण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के मात्र शुरुआती दो महीनों में ही कुछ चुनिंदा ग्राम पंचायतों में करोड़ों रुपये खर्च किए जाने और अधिकांश पंचायतों में अपेक्षाकृत बेहद कम राशि पहुंचने से प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जनपद पंचायत की कुल 89 ग्राम पंचायतों में से केवल छह पंचायतों में लगभग 2 करोड़ 60 लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई है। वहीं दूसरी ओर दर्जनों पंचायतें ऐसी हैं, जहां मनरेगा के तहत नगण्य कार्य हुए हैं।
आंकड़ों की जुबानी 6 पंचायतों की कहानी , बाकी का हाथ खाली
सरकारी खजाने से राशि निकालने की रफ्तार इतनी तेज है कि करोड़ों की बड़ी योजनाओं को भी पीछे छोड़ दिया गया है। जरा इन दो महीनों के खर्च के आंकड़ों पर नजर डालिए
ग्राम पंचायत रियाना : दो महीने के भीतर मनरेगा से रिकॉर्ड 58 लाख 12 हजार रुपये* खर्च कर दिए गए।
ग्राम पंचायत हथना : दो महीने में लाख 69 हजार रुपये का खर्च दर्शाया गया है।
ग्राम पंचायत घाट पिपरिया : दो महीने में 42 लाख 69 हजार रुपये ठिकाने लगा दिए गए।
ग्राम पंचायत दतला : दो महीने में 37 लाख 21 हजार रुपये की राशि आहरित हुई है।
ग्राम पंचायत बम्हौरी : दो महीने के भीतर 36 लाख 37 हजार रुपये का खर्च दर्ज है।
ग्राम पंचायत अधरौटा : दो महीने में 32 लाख 97 हजार रुपये की धनराशि का प्रवाह किया गया।
70 से अधिक पंचायतों में विकास की धीमी रफ्तार
जहां कुछ पंचायतों में लाखों रुपये की राशि खर्च हुई, वहीं दूसरी ओर जनपद की लगभग 70 से 75 पंचायतों में दो महीनों के दौरान 10 लाख रुपये तक का कार्य भी नहीं हो पाया। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि करीब 25 पंचायतों में एक लाख रुपये तक के कार्य दर्ज नहीं हुए हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मनरेगा जैसी योजना का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराना और स्थानीय विकास कार्यों को गति देना है। ऐसे में बजट वितरण का यह असंतुलन कई सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों के आरोप, पारदर्शिता पर सवाल
स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि बजट आवंटन में समानता के बजाय चुनिंदा पंचायतों को प्राथमिकता दी गई है। उनका कहना है कि जिन पंचायतों में पहले भी वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी हाजिरी जैसी शिकायतें सामने आती रही हैं, उन्हीं पंचायतों में सबसे अधिक बजट आवंटित किया गया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सीईओ की कार्यप्रणाली पर चर्चा फोन रिसीव नहीं किया
हमारे प्रतिनिधि ने जनपद पंचायत सीईओ हलदर मिश्रा से सम्पर्क करने की कोशिश की तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं कियाबजट वितरण के इन आंकड़ों के सामने आने के बाद जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) हलदर मिश्रा की मॉनिटरिंग और वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि मनरेगा का उद्देश्य सभी पंचायतों में रोजगार और विकास कार्यों को बढ़ावा देना है, तो बजट वितरण में इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई दे रहा है।
शब्द अग्नि के सवाल
- 75 पंचायतों में सीमित बजट आवंटन के बीच कुछ पंचायतों में 50 लाख रुपये से अधिक खर्च होने का आधार क्या है ?
- जिन पंचायतों में मनरेगा कार्य नगण्य हैं, वहां के मजदूरों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए ?
- क्या बजट वितरण में सभी पंचायतों के साथ समान व्यवहार किया गया ?
- पंचायतवार बजट आवंटन और स्वीकृत कार्यों की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही ?
जल्द ही शब्द अग्नि करेगा बड़ा खुलासा
शब्द अग्नि समाचार पत्र अपने पाठको के लिए जल्द ही इस बंदरबांट या विकास पर बड़ा खुलासा करेगा इस हेतु हमारी प्राथमिकता यह रहती हे की शासकीय मद विकास कार्यो में उचित खर्च हो किसी भ्र्ष्टाचार की भेंट ना चढ़े ना ही तथकथितं कुछ अधिकारियो की बंदरबांट बने
Author: Shabd Agni
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