जमीयत उलमा ए हिन्द के प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन सौंप कर यूसीसी पर राष्ट्रपति से की पुनर्विचार की माँग
शब्द अग्नि / खरगोन। मध्य प्रदेश में प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) के मसौदे को लेकर मुस्लिम समाज का विरोध तेज हो गया है। शुक्रवार को जमीयत उलमा के बैनर तले समाज के प्रबुद्धजनों ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में प्रस्तावित यूसीसी पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों से जुड़ा विषय बताया गया।
जमीयत उलमा ने जताई आपत्ति
जमीयत उलमा सदर हाफिज चांद, जनरल सेक्रेटरी मुफ्ती मुसअब जिलानी, हाजी जाकिर खान, मुफ्ती तारीक, मुफ्ती कलीम, मोहम्मद सादिक, मोहम्मद जुबेर, हाजी रियाज, मोहम्मद इरशाद सहित समाज के अन्य लोग कलेक्ट्रेट पहुंचे। प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपकर प्रस्तावित कानून के विभिन्न प्रावधानों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं।
शरीयत से समझौता नहीं करने की बात
जमीयत पदाधिकारियों ने कहा कि प्रस्तावित कानून इस्लाम और शरीयत के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज अपने धार्मिक मामलों में इस्लामिक शरीयत का पालन करता आया है और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े अधिकारों से किसी भी तरह का समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर लोकतांत्रिक और कानूनी तरीके से लड़ाई जारी रखी जाएगी।

ज्ञापन में कहा गया कि मुस्लिम समाज भारतीय संविधान का सम्मान करता है और संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के तहत अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का पालन करता है। प्रतिनिधियों ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं बनाया जाना चाहिए, जिससे किसी भी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका हो।
संविधान की अनुच्छेद 37 और 44 का उल्लेख
ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 44 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि समान नागरिक संहिता राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों का हिस्सा है। वहीं अनुच्छेद 37 के अनुसार नीति-निर्देशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं। इसलिए कानून बनाते समय संविधान के भाग 3 में दिए गए मौलिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
मुस्लिम पर्सनल लॉ का भी उल्लेख
ज्ञापन में मुस्लिम पर्सनल लॉ का उल्लेख करते हुए कहा गया कि मुस्लिम समाज विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में कुरान, हदीस और फिकह पर आधारित व्यक्तिगत कानूनों का पालन करता आया है। जमीयत ने इन प्रावधानों को केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि मुस्लिम समाज की धार्मिक आस्था और धार्मिक कर्तव्यों से जुड़ा विषय बताया।
पारदर्शी तरीके से पुनर्विचार की माँग
जमीयत उलमा ने राष्ट्रपति से मांग की कि प्रस्तावित समान नागरिक संहिता के प्रावधानों पर व्यापक और पारदर्शी तरीके से विचार किया जाए। साथ ही उन प्रावधानों पर पुनर्विचार किया जाए, जिनसे मुस्लिम समाज की धार्मिक स्वतंत्रता और निजी विधियों के प्रभावित होने की आशंका है। प्रतिनिधियों ने कहा कि इस संबंध में समाज अपनी आपत्तियां संवैधानिक और लोकतांत्रिक माध्यम से दर्ज कराता रहेगा।
Author: Shabd Agni
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